बिरसा वाणी ब्यूरो
नई दिल्ली: कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य और वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर सुप्रीम कोर्ट के हालिया आंतरिक आदेश को इंडिया गठबंधन की जीत बताया है।इंदिरा भवन स्थित कांग्रेस मुख्यालय में पत्रकार वार्ता करते हुए इस मामले के मुख्य वकील डॉ. सिंघवी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश में लिखा है कि यह महत्वपूर्ण मुद्दा है। याचिकाकर्ताओं के सभी बिंदु और दलीलें खुली हैं, किसी को बंद नहीं किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने आधार, वोटर आईडी और राशन कार्ड को विचार करने योग्य माना है। आंतरिक आदेश को लेकर किए जा रहे दुष्प्रचार को दूर करते हुए उन्होंने कहा कि मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई तक चुनाव आयोग भी कुछ नहीं कर सकता, क्योंकि प्रक्रिया जारी है। सिंघवी ने मुख्य बिंदुओं को विस्तार से समझाते हुए बताया कि चुनाव आयोग के अनुसार 2003 की मतदाता सूची में शामिल लोगों को नहीं छेड़ा जा रहा है, लेकिन 2003 के बाद जोड़े गए सभी मतदाताओं को संदिग्ध श्रेणी में डाल दिया गया है। लोगों को प्राथमिक रूप से यह साबित करना होगा कि वे यहां के नागरिक हैं, अन्यथा उन्हें हटा दिया जाएगा। उन्होंने बताया कि यह बोझ मतदाताओं पर उल्टा डाल दिया गया है, जबकि वे वर्षों से मतदाता सूची में पंजीकृत हैं। कांग्रेस नेता ने इस प्रक्रिया में 2003 की मतदाता सूची के बाद के लोगों को तीन कैटेगरी में बांटे जाने की भी जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि पहली कैटेगरी में व्यक्ति को खुद का जन्म प्रमाणपत्र देना होगा, दूसरी कैटेगरी में व्यक्ति को अपना या फिर माता-पिता में किसी एक का जन्म प्रमाणपत्र देना होगा और तीसरी कैटेगरी में व्यक्ति को खुद का व अपने माता-पिता दोनों का जन्म प्रमाणपत्र देना होगा। उन्होंने इसे अव्यवहारिक बताते हुए तर्क दिया कि दिल्ली जैसे बड़े शहरों में भी बहुत से लोग अपना स्वयं का जन्म प्रमाण पत्र आसानी से प्रस्तुत नहीं कर पाते, माता-पिता के जन्म प्रमाण पत्र की तो बात ही दूर है। सिंघवी ने कहा कि यह सब एक प्रशासनिक आदेश के द्वारा किया गया है, जबकि किसी कानून में बदलाव नहीं किया गया। इस पूरी प्रक्रिया में नागरिकता को देखा जा रहा है, लेकिन नागरिकता की कसौटी को देखने का अधिकार चुनाव आयोग के पास नहीं है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि एक बार मतदाता सूची में शामिल व्यक्ति को पूरी न्यायिक प्रक्रिया के बिना नहीं हटाया जा सकता।उन्होंने बताया कि संदिग्ध श्रेणी में लगभग पांच करोड़ मतदाता आते हैं। अगर इसमें से दो करोड़ लोग भी मतदाता सूची से हटते हैं तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हनन होगा।सिंघवी ने आश्चर्य व्यक्त किया कि चुनाव आयोग आधार, वोटर आईडी कार्ड और राशन कार्ड जैसे स्थापित पहचान दस्तावेजों को नजरअंदाज कर रहा है और इनके बजाय जन्म प्रमाण पत्र की मांग कर रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रक्रिया को दो-ढाई महीने में पूरा करना असंभव है, खासकर तब जब जुलाई-अगस्त का समय बाढ़ और मजदूरों के पलायन का चरम होता है।कांग्रेस नेता ने सवाल उठाया कि 2003 में जब पिछला विशेष गहन पुनरीक्षण हुआ था, उसके बाद से बिहार में पांच लोकसभा और पांच विधानसभा चुनाव हो चुके हैं। इन चुनावों में चुनाव आयोग को कोई आपत्ति नहीं थी, तो इस बार क्यों है? उन्होंने पूछा कि जब 2003 में यह प्रक्रिया हुई थी, तब विधानसभा चुनाव दो वर्ष दूर था और लोकसभा चुनाव एक वर्ष दूर था। इस बार चुनाव से कुछ महीने पहले ही ये प्रक्रिया क्यों शुरू की गई ?